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60 की उम्र में खेत से मंच तक: जंगली धान से बचा रहे जीवन!

✍️ Satish Kumar 📅 April 26, 2026
✅ Last Verified On: 26 Apr 2026

ओडिशा के एक आदिवासी किसान ने रासायनिक खेती के खिलाफ 60 सालों तक लड़ाई लड़ी है और आज वह सैकड़ों किसानों को जंगली धान की खेती और जैविक कृषि की सच्चाई सिखा रहे हैं। ग्रीन रिवोल्यूशन के दौरान जब सबने रासायनिक खाद की ओर रुख किया, तब इस आदिवासी किसान ने अपनी बुजुर्ग पीढ़ी की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को संरक्षित रखा। उनकी कहानी आज राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

✅ इस लेख में (Table of Contents) 🔻

60 की उम्र में खेत से मंच तक: जंगली धान से बचा रहे जीवन! - A Group Of People Sitting In Front Of A Sign
📸 60 की उम्र में खेत से मंच तक: जंगली धान से बचा रहे जीवन!
📌 त्वरित जानकारी (Quick Summary)
संबलपुर के संतोष धुरुआ ने रासायनिक खेती का बहिष्कार कर जैविक खेती अपनाई। वे आदिवासी पला नाटक देकर किसानों को जंगली धान और जैविक कीटनाशक के बारे में जागरूक कर रहे हैं। बीजामृत, जीवामृत और नीमास्त्र से वे स्थानीय धान की रक्षा करते हैं। इससे पेट की बीमारियां खत्म हो रही हैं और मिट्टी की स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है।

📍 मुख्य अपडेट्स (Organic Farming Mission)

  • संतोष धुरुआ ने तीन एकड़ जमीन पर सूना हरिनी, कुसुम काली और काला चम्पा जैसे देसी धान लगाए हैं।
  • उन्होंने पीतल पात्र में भुने चावल का पानी में गोबर मिलाकर पेजास्ट्रा बनाया, जो किरट से बचाता है।
  • ओडिशा डेसी बीहना मंच और संभाव संगठन के संपर्क से उन्होंने जैविक खेती का ज्ञान लिया।
  • पला लोकनाट्य दिखाकर वे पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती का संदेश देते हैं।
  • आदिवासी समुदाय के किसानों को आटीएमए की सलाह के माध्यम से जैविक प्रणाली अपनाने में मदद मिल रही है।
  • डॉ. सुभाष पालेकर और डॉ. सबर्मणा टीकी के प्रशिक्षण से जैविक उर्वरक का निर्माण अब उनके दैनिक काम है।

🌾 पारंपरिक से जुड़ी बुजुर्ग पीढ़ी का ज्ञान

इनके पिता नृपानी धुरुआ के समय से ही यह परिवार गोबर और पुरानी खेती विधि पर विश्वास करता था। 1976 में परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर संतोष ने पढ़ाई छोड़ दी और खेती पर लग गए। जब 2004-05 से 2010-11 तक वे एटीएमए के अध्यक्ष रहे, तब उन्हें ऑर्गेनिक टेक्नोलॉजी और स्थानीय किसानों के साथ काम करने का मौका मिला।

🧪 जैविक खेती की सफलता के राज

बीजामृत के लिए गोबर, गोमूत्र, मिट्टी, पानी और चूने का मिश्रण तैयार कर बीजों को इसमें 15 मिनט तक भिगोया जाता है। इसके बाद छाया में सुखाकर जीवामृत से समृद्ध की गई जमीन में बोया जाता है। नीमास्त्र, अग्निस्त्र और ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कीटों से बचाव के लिए किया जाता है। स्थानीय देसी धान अक्सर कीट प्रतिरोधी होते हैं। यदि कभी कीट हमला करते हैं, तो इन जैविक उपायों से खेत को सुरक्षित रखा जाता है।

🎭 किसानों को जागरूक करने वाला पला लोकनाट्य

पला नाटक के जरिए संतोष लोगों को पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती का संदेश देते हैं। इस नाट्य नाटिका में जंगली धान और देसी बीज के महत्व को दर्शाया जाता है। दर्शकों को इसके माध्यम से रासायनिक मुक्त खेती करने के तरीके समझाए जाते हैं।

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🤝 सहयोग और प्रशिक्षण की कहानी

सरोज कुमार मोहंती और उनके संगठन ओडीबीएम के माध्यम से संतोष को जैविक खेती का व्यावहारिक ज्ञान मिला। 2013-14 में संभाव के माध्यम से उन्हें डॉ. सबर्मणा टीकी से मुलाकात हुई। इसके बाद 2017-18 में डॉ. सुभाष पालेकर के प्रशिक्षण से जैविक उपायों का निर्माण उन्होंने खुद किया। अब वे अपने गांव और आसपास के किसानों को यह तकनीक सिखाते हैं।

📌 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जंगली धान की खेती मुख्य रूप से किन उपायों से संभव है?

जंगली धान की खेती में बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र और पेजास्ट्रा जैसे जैविक उपायों का उपयोग किया जाता है। इनसे कीटों से बचाव और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है।

आदिवासी किसान संतोष धुरुआ ने रासायनिक खेती को क्यों छोड़ा?

उन्होंने रासायनिक खेती के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं और मिट्टी की क्षमता खराब होने को देखा। इसलिए उन्होंने अपनी पुरानी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली और जैविक खेती को फिर से अपनाया।

पला लोकनाट्य दिखाकर किस मुद्दे पर जागरूकता दी जा रही है?

पला नाटक के जरिए जंगली धान, देसी बीज और जैविक खेती के महत्व पर जागरूकता दी जा रही है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है।

🔗 Reference / Official Source: कृषि मंत्रालय (Agriculture Department)

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